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_erda
082 _223
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_b008882
100 1 _aसोपान जोशी
_eलेखक.
245 1 _aजल थल मल /
_cसोपान जोशी.
246 _aWater, land and sewage
260 _aनई दिल्ली :
_bगांधी शांति प्रतिष्ठान,
_c2011.
300 _a273 p. :
_bill. ;
_c24 cm.
336 _2rdacontent
_atext
_btxt
337 _2rdamedia
_aunmediated
_bn
338 _2rdacarrier
_avolume
_bnc
520 _aकई तरह की संज्ञाएं हैं: पाखाना, टट्टी, दीर्घ शंका, दिशा मैदान, मलत्याग, टॉएलेट...। पर क्रिया एक ही है। हम में से हर एक इस क्रिया को हर रोज़ करता है। इस क्रिया का अनुभव और नतीजा लेकिन हर किसी का अलग होता है। कोई खुले में जाता है, कोई बमपुलिस में, कोई चमचामते शौचालय में। किसी का मल खुले में पड़ा रहता है, जानलेवा बीमारियां फैलाता है। किसी का मल-मूत्र सीवर की नालियों से होता हुआ नदी-तालाब को ही नहीं, हमारे भविष्य तक को दूषित करता है। कुछ ऐसे भी हैं जिनका मल-मूत्र खाद बनकर खाद्य सुरक्षा में काम आता है। हमारा शरीर मिट्टी की उर्वरता से सीधा जुड़ा हुआ है, पानी की निर्मलता से भी। मल-मूत्र की यह कहानी स्वास्थ्य और पर्यावरण से तो जुड़ी है ही, इसमें विज्ञान भी है और धार्मिक आचरण भी, इतिहास है और भविष्य भी। ये कहानी है जल और थल के हमारे मल से संबंध की। ये सब टटोलती हुई एक सचित्र किताब अब छपने की तैयारी में है। जो साथी छपाई से पहले किताब की प्रतियां लेंगे, वे किताब छापने में हमारी मदद करेंगे।
650 0 _aजल स्वच्छता
_zनई दिल्ली
_zभारत.
650 0 _aWater sanitation
_zNew Delhi
_zIndia.
650 0 _aमलजल निपटान
_zनई दिल्ली
_zभारत.
650 0 _aSewage disposal
_zNew Delhi
_zIndia.
942 _2ddc
_cBK