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जल थल मल / सोपान जोशी.

By: सोपान जोशी [लेखक.].
Material type: materialTypeLabelBookPublisher: नई दिल्ली : गांधी शांति प्रतिष्ठान, 2011Description: 273 p. : ill. ; 24 cm.Content type: text Media type: unmediated Carrier type: volumeISBN: (pbk.).Other title: Water, land and sewage.Subject(s): जल स्वच्छता -- नई दिल्ली -- भारत | Water sanitation -- New Delhi -- India | मलजल निपटान -- नई दिल्ली -- भारत | Sewage disposal -- New Delhi -- IndiaDDC classification: 363.72095456 SOP Summary: कई तरह की संज्ञाएं हैं: पाखाना, टट्टी, दीर्घ शंका, दिशा मैदान, मलत्याग, टॉएलेट...। पर क्रिया एक ही है। हम में से हर एक इस क्रिया को हर रोज़ करता है। इस क्रिया का अनुभव और नतीजा लेकिन हर किसी का अलग होता है। कोई खुले में जाता है, कोई बमपुलिस में, कोई चमचामते शौचालय में। किसी का मल खुले में पड़ा रहता है, जानलेवा बीमारियां फैलाता है। किसी का मल-मूत्र सीवर की नालियों से होता हुआ नदी-तालाब को ही नहीं, हमारे भविष्य तक को दूषित करता है। कुछ ऐसे भी हैं जिनका मल-मूत्र खाद बनकर खाद्य सुरक्षा में काम आता है। हमारा शरीर मिट्टी की उर्वरता से सीधा जुड़ा हुआ है, पानी की निर्मलता से भी। मल-मूत्र की यह कहानी स्वास्थ्य और पर्यावरण से तो जुड़ी है ही, इसमें विज्ञान भी है और धार्मिक आचरण भी, इतिहास है और भविष्य भी। ये कहानी है जल और थल के हमारे मल से संबंध की। ये सब टटोलती हुई एक सचित्र किताब अब छपने की तैयारी में है। जो साथी छपाई से पहले किताब की प्रतियां लेंगे, वे किताब छापने में हमारी मदद करेंगे।
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Item type Current location Call number Status Date due Barcode
Book Book Indian Institute for Human Settlements, Bangalore
363.72095456 SOP 008881 (Browse shelf) Available 008881
Book Book Indian Institute for Human Settlements, Chennai
363.72095456 SOP 008882 (Browse shelf) Available 008882
Book Book Indian Institute for Human Settlements, Chennai
363.72095456 SOP 012138 (Browse shelf) Available 012138

कई तरह की संज्ञाएं हैं: पाखाना, टट्टी, दीर्घ शंका, दिशा मैदान, मलत्याग, टॉएलेट...। पर क्रिया एक ही है। हम में से हर एक इस क्रिया को हर रोज़ करता है। इस क्रिया का अनुभव और नतीजा लेकिन हर किसी का अलग होता है। कोई खुले में जाता है, कोई बमपुलिस में, कोई चमचामते शौचालय में।

किसी का मल खुले में पड़ा रहता है, जानलेवा बीमारियां फैलाता है। किसी का मल-मूत्र सीवर की नालियों से होता हुआ नदी-तालाब को ही नहीं, हमारे भविष्य तक को दूषित करता है। कुछ ऐसे भी हैं जिनका मल-मूत्र खाद बनकर खाद्य सुरक्षा में काम आता है।

हमारा शरीर मिट्टी की उर्वरता से सीधा जुड़ा हुआ है, पानी की निर्मलता से भी। मल-मूत्र की यह कहानी स्वास्थ्य और पर्यावरण से तो जुड़ी है ही, इसमें विज्ञान भी है और धार्मिक आचरण भी, इतिहास है और भविष्य भी। ये कहानी है जल और थल के हमारे मल से संबंध की।

ये सब टटोलती हुई एक सचित्र किताब अब छपने की तैयारी में है। जो साथी छपाई से पहले किताब की प्रतियां लेंगे, वे किताब छापने में हमारी मदद करेंगे।

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